बिहार के मक्का उत्पादक किसानों की किस्मत बदलने के लिए कृषि विज्ञानियों ने एक बड़ा खोज किया है।
पूरे 11 वर्षों के कड़े अनुसंधान और कड़े परीक्षणों के बाद डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के विज्ञानियों ने मक्के का नया संकर (हाइब्रिड) प्रभेद विकसित किया है, जो किसानों के लिए वरदान साबित होगा।
विश्वविद्यालय की अनुसंधान परिषद की बैठक में ‘राजेंद्र हाइब्रिड-5’ और ‘राजेंद्र हाइब्रिड-6’ को संपूर्ण बिहार के किसानों के लिए जारी कर दिया गया है।
यह नई किस्म न केवल बिहार की जलवायु और मिट्टी के पूरी तरह अनुकूल है, बल्कि इसकी उत्पादन क्षमता भी बेहद शानदार है।
11 वर्षों की मेहनत से तैयार हुआ बीज
कृषि विश्वविद्यालय के तिरहुत कृषि महाविद्यालय, ढोली के अनुवांशिकी एवं पादप प्रजनन विभाग द्वारा प्रयोगशाला और खेतों में कई दौर के सफल परीक्षणों के बाद इसे हरी झंडी दी गई है।
कुलपति डॉ. पीएस पांडे के मार्गदर्शन और मुख्य विज्ञानी डॉ. अजय कुमार के नेतृत्व में डॉ. फूलचंद, डॉ. धर्मेंद्र और डॉ. तनवीर आलम की टीम ने इस प्रभेद को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
विज्ञानियों ने रबी मौसम के लिए इन दोनों प्रभेदों को सबसे उत्तम और अभी तक के सभी प्रभेदों से अधिक उपज देने वाला पाया है।
भुट्टा पकने के बाद भी हरा पौधा
मुख्य विज्ञानी डॉ. अजय कुमार ने बताया कि ‘राजेंद्र हाइब्रिड मक्का-5’ की खेती पूरे बिहार में की जा सकती है। यह मध्यम अवधि में यानी 135 से 140 दिनों में पककर तैयार होने वाला ‘स्टे ग्रीन’ संकर मक्का है।
इस प्रभेद की सबसे बड़ी खासियत यह है कि भुट्टा (दाने) पूरी तरह पकने और कटाई के समय तक भी इसका पौधा बिल्कुल हरा रहता है। इससे किसानों को दोहरा लाभ होगा; उन्हें अनाज तो मिलेगा ही, साथ ही कटाई के बाद बचा हुआ हरा डंठल पशुओं के लिए बेहद पौष्टिक चारे के रूप में काम आएगा।
100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की उत्पादन क्षमता
‘राजेंद्र हाइब्रिड मक्का-5’ की उत्पादन क्षमता 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक है। इसके दाने आकर्षक, मोटे और नारंगी-पीले रंग के होते हैं, जिन्हें बाजार में अच्छा भाव मिलेगा।
इसके अलावा, यह फसल टर्शिकम एवं मेडिस लीफ ब्लाइट जैसे प्रमुख रोगों के प्रति पूरी तरह प्रतिरोधी है, जबकि तनाछेदक और खतरनाक आर्मी वर्म कीटों के खिलाफ इसमें मध्यम प्रतिरोधी क्षमता है। यानी इस फसल में बीमारियां और कीड़े लगने का खतरा बहुत कम होगा।
राजेंद्र हाइब्रिड-6 से और भी बंपर उपज
इसी श्रृंखला में जारी किया गया दूसरा प्रभेद ‘राजेंद्र हाइब्रिड मक्का-6’ सामान्य तौर पर 150 से 160 दिनों में तैयार होता है। इसकी उपज क्षमता और भी अधिक यानी 108 से 110 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक है।
यह प्रभेद विभिन्न प्रकार की कृषि-जलवायु परिस्थितियों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करता है और सिंचित के साथ-साथ वर्षा आधारित दोनों क्षेत्रों के लिए बेहद उपयुक्त है। इसके पीले और मोटे दानों की उच्च गुणवत्ता के कारण किसानों को बाजार में इसका प्रीमियम मूल्य मिल सकेगा।
पशु आहार और एथेनॉल के लिए बेस्ट
इन दोनों संकर प्रभेदों को विकसित करने का मुख्य उद्देश्य किसानों की लागत घटाकर उनका मुनाफा बढ़ाना और जलवायु परिवर्तन के खतरों से फसल को सुरक्षित रखना है।
विज्ञानियों के अनुसार, मक्के की यह नई किस्में मुर्गी फार्म और पशु आहार उद्योग के लिए सर्वोत्तम हैं। इसके साथ ही, बिहार में तेजी से बढ़ रहे एथेनॉल उत्पादन के लिए भी इन दानों को बेहद उपयुक्त पाया गया है।
इस तकनीकी विकास से न केवल बिहार बल्कि पूरे पूर्वी भारत में मक्का क्रांति आने की उम्मीद है।