अगर आप कमोडिटी बाजार (एमसीएक्स या एनसीडीईएक्स) में ट्रेडिंग करते हैं, तो टैक्स नियमों को समझना जरूरी है। इनकम टैक्स विभाग कमोडिटी की कमाई को ‘बिजनेस इनकम’ मानता है, न कि कैपिटल गेन्स। कानपुर इनकम टैक्स बार एसोसिएशन के पूर्व महामंत्री सीए शैलेश शर्मा के अनुसार साल 2026 में रिटर्न फाइल करते समय इन बातों का ध्यान रखें।
1. मुनाफा और नुकसान दोनों से जुड़कर बनता है टर्नओवर: टैक्स के लिए टर्नओवर का मतलब कुल सौदों की कीमत नहीं है। आपके सभी ट्रेड में हुए कुल मुनाफे और कुल नुकसान के जोड़ को ही टर्नओवर माना जाता है। इसलिए टर्नओवर का भी आकलन इसी तरह करें।
2. सही कैटेगरी चुनें: वायदा-कारोबार के नुकसान को आप आठ साल तक आगे बढ़ा सकते हैं। वहीं, बिना डिलीवरी वाले सेम-डे ट्रेड को सट्टा माना जाता है, इसका नुकसान सिर्फ सट्टा मुनाफे से ही कटेगा।
3. खर्चों पर बचाएं टैक्स: यह बिजनेस इनकम है, इसलिए आप ट्रेडिंग से जुड़े खर्चे जैसे- ब्रोकरेज, जीएसटी, कमोडिटी ट्रांजैक्शन टैक्स , इंटरनेट बिल और कंप्यूटर पर डेप्रिसिएशन घटाकर टैक्स लायबिलिटी कम कर सकते हैं।
4. आइटीआर-तीन फार्म है जरूरी: एक्टिव कमोडिटी ट्रेडर्स के लिए आइटीआर-तीन फार्म भरना होता है। अगर टर्नओवर कम है और आप हिसाब-किताब के झंझट से बचना चाहते हैं, तो धारा 44 एडी के तहत कुल टर्नओवर का सीधा छह प्रतिशत मुनाफा दिखाकर आइटीआर-चार भी चुन सकते हैं।
5. टैक्स आडिट का नियम: अगर आपका डिजिटल टर्नओवर 10 करोड़ रुपये से ज्यादा है, तो आडिट अनिवार्य है। वहीं, अगर टर्नओवर 10 करोड़ रुपये से कम है लेकिन आप छह प्रतिशत से कम मुनाफा या नुकसान दिखा रहे हैं, तो भी सीए से आडिट कराना होगा।