केरल हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार और संसद से ईसाई महिलाओं से जुड़े 157 साल पुराने ‘तलाक अधिनियम, 1869’ में बदलाव करने की सिफारिश की है।
केरल कोर्ट ने यह कदम घरेलू हिंसा की शिकार एक ईसाई महिला की याचिका पर सुनवाई के दौरान उठाया, जिसकी तलाक की अर्जी को फैमिली कोर्ट ने सिर्फ यह कहकर खारिज कर दिया था क्योंकि तलाक अधिनियम 1869 के तहत केस वहीं दर्ज हो सकता है जहां शादी हुई हो।
क्या है कानून
कानून की धारा 3(3) के अनुसार, ईसाई जोड़े केवल तीन ही जगहों की कोर्ट में तलाक का केस दर्ज कर सकते हैं। पहला- जहां उनकी शादी हुई थी, दूसरा जहां पति-पत्नी वर्तमान में एक साथ रह रहे हों और तीसरा पति-पत्नी वर्तमान में एक साथ रह रहे हों
हालांकि, इस पुराने कानून में यह प्रावधान नहीं है कि पीड़ित महिला जहाँ वर्तमान में रह रही है या शरण लिए हुए है, वहाँ से केस लड़ सके, जिसके कारण महिलाओं को न्याय के लिए लंबी, खर्चीली और असुरक्षित यात्राएं करने पर मजबूर होना पड़ता है।
महिलाओं के लिए और क्या है विकल्प?
ऐसे मामले में महिला को हले कासरगोड कोर्ट में तलाक का केस दर्ज कराना होगा। इसके बाद वह तुरंत हाई कोर्ट में ट्रांसफर पिटीशन दायर कर सकती है। दोनों जिले केरल में हैं, ऐसे में तुरंत हाई कोर्ट में ट्रांसफर पिटीशन दायर कर सकती है। यदि पति-पत्नी दोनों अलग राज्यों में रहते तो केस ट्रांसफर कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ता।
ऐसे मामले पहले भी आ चुके हैं सामने
साल 2001 में कानूनी चुनौती के बाद डिवोर्स एक्ट, 1869 की भेदभाव वाली धाराओं में संशोधन हुआ था। संसद ने कानून बदलकर ईसाई महिलाओं और पुरुषों को तलाक के मामले में बराबर का अधिकार दिया।
इसी तरह 1986 में मैरी रॉय केस में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सीरियाई ईसाई महिलाओं को पैतृक संपत्ति में पुरुषों के बराबर अधिकार देने का आदेश दिया था।